गुरुवार, 19 जुलाई 2012

जिंदा तो रहूँ पर जिन्दा नहीं.........

जिंदगी ये आजकल किस मोड़ पर ले आई मुझे,
रिश्तों के बंधन में बंधा था , मैं कल तलक 
 क्यों आज कोई अपनाता नही मुझे।
इस हाल में हूँ आज मैं , कि 
जिन्दा हूँ पर जिन्दा नही.............
सोचता हूँ क्या वजह है  दुनिया तेरे तिरस्कार की ,
रहा करता था हरदम महफ़िलों में 
पर क्यूं आज नही मेरे पास भी।
लग रहा है जाने- अनजाने, शायद 
कोई पाप कोई अपराध हमसे हो गया 
पर.... यारो ऐसी सजा मत दो मुझे  मेरे अपराध की 
घुट के दम निकले मेरा, और न निकले आह भी 
मार दो या छोड़ दो मुझको, उसके इन्साफ पे 
मैं अकेला पापी नही इस जहान में 
ये जानते है आप भी ....
फिर ,ऐसी सजा मत दो मुझे ...
जिन्दा तो रहूँ पर जिन्दा नही ................  

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

काश !

काश ! 
कुछ ऐसा हुआ होता ,
तुम्हें भी किसी से प्यार हुआ होता ,
जिस तरह तुमसे मिलने को तरसता हूँ मै ,
तुम्हें भी उसी आग में जलना होता....


ना कोई दुआ रंग लाती, 
ना कोई दवा का असर होता ,
दिल चाहता की कोई जतन करूँ ,
दीवानों सी हालत होती ,
बेगानों -सा हाल होता ,
हमेशा खुद को अपने और ,
अपनों के हाथों मजबूर पाती ,
अपने पराये नज़र आते ,
दुनिया में कोई सहारा न होता ..............

रविवार, 15 अगस्त 2010

"प्रेरणा"

याद आती हो जब तुम
अकेले में मुझे ,
रुलाती है तेरी वो प्यार भरी बातें ,
वो दौड़ के कहना आ छूले।
अक्सर ख़याल आता है दिल में ,
तुम इतनी दूर क्यों हो मुझसे,
सोचता हूँ, जहाँ तुम हो,
वहां मैं भी पहुंचु ,
छू न सकूँगा किन्तु तुमको।
दुःख तो है इस बात का,
मगर शिकवा नहीं है कोई,
बल्कि ख़ुशी है इससे,
कि "प्रेरणा" मिलती रहेगी मुझे,
निरंतर आगे बढ़ने कि तुमसे।

कविता

रविवार, 23 अगस्त 2009

आख़िर क्यों .................

तेरे शहर में आने का ,जब भी मिला मौका मुझे ,
ढूंढा मैंने, तुझसे मुलाकात का ,कोई न कोई अवसर ।
बस, तेरी एक झलक पा लेने को मचल उठता है ये दिल,
और ये सोचकर , की तुम दिख्जोगी शायद वहां,
तेरी गलियों से मै गुजरता रहा हूँ अक्सर ।
तुझे देखकर ,नजर के सामने पाकर
साँसें रुक सी जाती है ,धड़कन थम सी जाती हैं ।
जी मै आता है तुझे जी भरकर देखूं , प्यार करूँ
किंतु सालती हैं मुझे तेरी बेरुखी, वो बेगानापन,
और निभाना औपचारिकताएं ।
कुछ मिलना इस तरह कि जैसे मै कोई अजनबी हूँ ,
मै जानना चाहता हूँ तेरे इस सब का सबब ,
आख़िर क्यों ? तुम मेरे पास होकर भी करीब नहीं ।

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

मैं ताजों के लिए समर्पण वंदन गीत नहीं गाता,
दरबारों के लिए अभिनन्दन गीत नहीं गाता,
गौण भले हो जाऊं लेकिन मौन नहीं रह सकता मैं,
पुत्र मोह में शस्त्र त्याग कर द्रौंण नही हो सकता में,
कितने पहरेदार बिठा दो मेरी क्रुद्ध निगाहों पर,
में दिल्ली से बात करूँगा भीड़ भरे चौराहों पर,
कश्मीर जो ख़ुद सूरज के बेटे की राजधानी थी,
डमरू वाले शिवशंकर की जो घाटी कल्याणी थी,
कश्मीर जो इस धरती का स्वर्ग बताया जाता है,
जिस मिटटी को दुनिया भर मे अर्घ्य चढाया जाता,
कश्मीर जो डूब गया है अंधी गहरी खायी में,
फूलों की खुशबु रोटी है मरघट की तन्हाई मे,
मैं अग्निगंधा मौसम की बेला हूँ,
गंधों के घर बंदूकों का मेला हूँ,
मैं भारत की जनता का संबोधन हूँ,
आंसू के अधिकारों का उदबोधन हूँ,
मैं अविविधा परम्परा का chaaran हूँ,
आंखों के आंसू का उच्चारण हूँ,
इसलिए दरबारों को दर्पण दिखलाने निकला हूँ,
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ....................
बस नारों में गाते रहिएगा कश्मीर हमारा है,
छूकर देखो हर हिम्चोटी के नीचे इक अंगारा है,
दिल्ली अपना चेहरा देखे धुल हटाकर दर्पण की,
दरबारों की तस्वीरे भी हैं बेशर्म समर्पण की,
काश्मीर है जहाँ तमंचे हैं केशर की क्यारी में,
काश्मीर है रुंदन जहाँ बच्चों की किलकारी में,
काश्मीर है जहाँ तिरंगे झंडे फाड़े जाते हैं,
४७ के बंटवारे के घाव उघडे जाते हैं,
काश्मीर है जहाँ हौंसलों के दिल तोडेजाते हैं,
काश्मीर है जहाँ खुदगर्जी मेंजेलों से हत्यारे छोडे जाते है,
अपहरणों की रोज़ कहानी होती है,
धरती मैया पानी पानी होती है,
झेलम की लहरे भी आंसू लगती है,
ग़ज़लों की बहरे भी आंसूं लगती हैं,
मैं आंखों के पानी का संत्रास मिटाने निकला हूँ,
मैं घायल घाटी के दिल की....................
जिनको भारत की धरती न भाती हो,
भारत के झंडों से बदबू आती हो,
जिन लोगों ने माँ का आँचल फाडा हो,
दूध भरे सीने मे चाकू गाडा हो,
मैं गद्दारों को फांसी चढ़वाने निकला हूँ,
मैं घायल घाटी के दिल की....................
राजमहल को शर्म नहीं है घायल होती धरती पर,
भारत मुर्दाबाद लिखा है श्रीनगर की धरती पर,
मन करता है फूल चढ़ा दू लोकतंत्र की अर्थी पर,
भारत के बेटे ही ही ख़ुद निर्वासित हैं अपनी धरती पर,
वे भारत से खेल रहे हैं गैरों के बलबूते पर,
जिनकी नाक टिकी रहती थी हिन्दुस्तानी जूतों पर,
कश्मीर को बंटवारे का धंधा बना रहे है,
जुगनू को बैसाखी देकर चंदा बना रहे है,
फिर भी खून सने हाथो को न्योता है दरबारों का,
जैसे सूरज की किरणों पर कर्जा हो अंधियारों का,
कुलवंती दासी हो गई रखैलों की,
आज ज़रूरत है सरदारों पटेलों की,
क्या डरना अमेरिका के आकाओ से,
आँख मिलाओ दुनिया के दादाओं से,
अपने भारत के बाजू बलवान करो,
पाँच नहीं पाँच सो atom bam nirmaan करो,
मैं भारत को दुनिया का sirmour बनाने निकला हूँ ,
मैं घायल घाटी के दिल की....................
मैं bajrangbali को उनकी ताकत याद dilaata हूँ,
इसलिए मैं कविता को hathiyaar banakar गाता हूँ,
मैं घायल घाटी के दिल की....................


रविवार, 26 जुलाई 2009

kavita

सुबह-सुबह दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी ,
उठकर दरवाजा खोला तो सामने तुम दिखाई दी ,
तुम धीरे से मुस्करायी और अन्दर आई ,
आगे बढ़कर तुम्हें जब गले लगाया तो दिल भर आया ,
जो बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो ,
तुम्हारे साथं गुजरे हर-एक पल को याद किया ,
हर कसमे-वादे को याद किया ,
हर-पल में कई पलों को जिया ,
दिल ने चाहा , काश! ये वक्त यहीं ठहर जाए ,
छोड़ के वो मुझे फ़िर जा न पाए ,
अचानक ! अलार्म की घंटी सुनाई दी ,
आँख खुली तो तुम न दिखाई दी ,
सरसरी निगाह से तुम्हे कमरे में ढूंढा ,
घड़ी पर नजर डाली तो सुबह के सात बजे थे ,
तब समझ में आया की हम सपनों में मिले थे ,
फ़िर दिल से यही दुआ निकली ,
काश! ये सच होता, तो कितना अच्छा होता .........................................